“जिस्म देखने की कीमत है, लेकिन सम्मान बचाने की जिम्मेदारी कौन लेगा?”
क्या महिला सिर्फ देखने की वस्तु है? या वह भी हमारी तरह एक इंसान है
नमस्कार,
“बात जनता की साथ रविश के जनता के समस्याओं का समाधान संविधान के साथ”
आज सवाल सिर्फ महीला सुरक्षा या फिर उसके अधिकार की रक्षा स्वतंत्रता के साथ साथ हमारी सोच का भी है
एक तरफ महिलाओं के शरीर को देखने और उनका शोषण करने वाली चीजों पर लोग पैसा खर्च करते हैं।
दूसरी तरफ, जब किसी महिला को सम्मान, सुरक्षा, शिक्षा या मदद की जरूरत होती है, तो समाज पीछे हट जाता है।
भीड़, सड़क, अकेली महिला की प्रतीकात्मक छवि आपसे ये सीधा सवाल पुछती है कि
क्या महिला एक देखने की चीज है या अपमानित करने वाली एक बस्तु क्या लगता है ऐसे सोच के पीछे कैसी-कैसी सभ्यता संस्कृति और समाजिक सोच छिपकर भारत के असली सभ्यता का चीर-हरण कर रही है आप वो सभी सीता हरण द्रौपदी से लेकर आज की निर्भया व अन्य गरीब मौसम कुमारी के दृश्य और घटनाओं को एक बार रिव्यू कर क्रमबद्ध तरीके से देखेंगे तो आपको असली चेहरा दिखने लगेगा मुझे ऐसी सोच और व्यवस्था को धारण करने वाले राक्षसों को देखना होगा और समाजिक बहिष्कार करना होगा क्योंकि हम सब को लगता है कि इस तरह की शिक्षा और व्यवस्था की शुरुआत करने वाला ही असली जिम्मेदार चेहरा है
महिला की सुरक्षा कानून और समाज—दोनों की जिम्मेदारी है।
पीड़िता से यह मत पूछिए कि उसने क्या पहना था या रात में बाहर क्यों निकली।
सवाल अपराधी से होना चाहिए—
उसने अपराध क्यों किया?
और व्यवस्था से—
पीड़िता को न्याय कब और कितनी संवेदनशीलता से मिलेगा?
ऐसा समाज बनाइए जहाँ मदद के लिए किसी हादसे का इंतजार न करना पड़े।
जहाँ लड़कियाँ डरकर नहीं, अधिकार और सम्मान के साथ जिएँ।
जहाँ लड़कों को सिखाया जाए—
सहमति के बिना किसी के शरीर पर किसी का अधिकार नहीं।
याद रखिए—
महिला की इज्जत उसके कपड़ों में नहीं,
उसकी इंसान होने की गरिमा और अधिकारों में है।
अपराध के बाद आंदोलन जरूरी है,
लेकिन अपराध रोकने वाली सोच बनाना उससे भी अधिक जरूरी है।
महिलाओं की सुरक्षा किसी एक दिन का मुद्दा नहीं—
यह हर दिन, हर नागरिक की जिम्मेदारी है।
आप सोच रहे हैं
“बात जनता की साथ रविश के”।
जनता के अधिकारों की रक्षा — संविधान के साथ।