लोकतंत्र में चुनाव आयोग के महत्व को शर्मसार करने वालों को कड़े से कड़े दंड दिया जाना चाहिए
लोकतंत्र में चुनाव आयोग को दलतंत्र बनने से रोकना होगा लोकतांत्रिक सोच जरूरी है भारतीय लोकतंत्र के लिए
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नमस्कार
मैं रविश कुमार आप देख रहे हैं
“बात जनता की साथ रविश के जनता के समस्याओं का समाधान संविधान के साथ”
*लोकतंत्र की मजबूती के लिए चुनाव सुधार जरूरी*
*जाति-धर्म के समीकरण से मुद्दों और जनहित की राजनीति तक*
लोकतंत्र में चुनाव का उद्देश्य केवल सरकार बनाना नहीं, बल्कि जनता की इच्छा और जनहित को सरकार का आधार बनाना होना चाहिए। लेकिन आज चुनावों में जाति, धर्म, अगड़ा-पिछड़ा, स्थानीय-बाहरी और दूसरे सामाजिक समीकरण कई बार रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, किसान, मजदूर, उद्योग और विकास जैसे असली मुद्दों पर भारी पड़ जाते हैं।
राजनीतिक दल भी इन समीकरणों को चुनाव जीतने का आधार बनाते हैं। जब किसी सीमित सामाजिक समीकरण के सहारे चुनाव जीता जा सकता है, तो सभी वर्गों को साथ लेकर चलने और जनता के ज्वलंत मुद्दों पर चुनाव लड़ने की मजबूरी कम हो जाती है।
इस स्थिति को बदलने के लिए चुनाव व्यवस्था में सुधार जरूरी है।
*मतदान का पचास फीसदी वाला नियम (50 Percent Voting Rule)*
किसी उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिए कुल वैध मतों का 50 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त करना अनिवार्य किया जाना चाहिए।
यदि पहले चरण में किसी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से अधिक मत नहीं मिलता है, तो सबसे अधिक मत पाने वाले दो उम्मीदवारों के बीच तुरंत दूसरा चुनाव यानी रनऑफ कराया जाए।
सरल शब्दों में,पहले चुनाव में यदि किसी को आधे से अधिक जनता का समर्थन नहीं मिला, तो फैसला दोबारा जनता से लिया जाए।
इससे केवल जाति, धर्म या किसी एक सामाजिक समीकरण के सहारे चुनाव जीतना कठिन होगा। उम्मीदवारों को अलग-अलग वर्गों और समुदायों के लोगों का समर्थन लेना पड़ेगा।
तब चुनाव में यह सवाल अधिक महत्वपूर्ण होगा-
“किस जाति के कितने वोट हैं?” के बजाय
“कितने लोगों का विश्वास हासिल कर सकते हैं और उनके लिए क्या करेंगे?”
इससे राजनीति को समीकरण की राजनीति से मुद्दों की राजनीति की ओर ले जाने में मदद मिल सकती है।
*चुनावी वादों की भी जवाबदेही हो (Accountability of Election Promises)*
राजनीतिक दल चुनाव के समय घोषणा-पत्र जारी करते हैं और जनता से अनेक वादे करते हैं। लेकिन सरकार बनने के बाद उन वादों को पूरा करने की कोई मजबूत और प्रभावी जवाबदेही व्यवस्था नहीं है।
इसलिए घोषणा-पत्र को केवल चुनावी प्रचार का दस्तावेज नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही का दस्तावेज बनाया जाना चाहिए।
सरकार बनने के बाद हर साल सार्वजनिक रूप से बताया जाए कि-कितने वादे पूरे हुए, कितने अधूरे हैं और अधूरे रहने का कारण क्या है।
साथ ही, जिन विषयों पर चुनाव में जनता से कोई स्पष्ट वादा नहीं किया गया, विशेषकर जनप्रतिनिधियों के वेतन, भत्ते और सरकारी सुविधाओं से जुड़े फैसलों के लिए भी पारदर्शी और स्वतंत्र मानदंड होने चाहिए।
*निर्वाचन आयोग भी कानून के अनुसार काम करे (Election Commission and Rule of Law)*
आज निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों और विपक्ष की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसे आरोपों की सत्यता का निर्णय तथ्यों और कानून के आधार पर होना चाहिए। लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है,चुनाव जैसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जनता का विश्वास और पारदर्शिता सबसे जरूरी है।
निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत उसे चुनावों के संचालन और मतदाता सूची से संबंधित अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी दी गई है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आयोग अपनी इच्छा से चुनाव के मूल नियम बदल सकता है।
संसद द्वारा बनाए गए चुनाव संबंधी कानून और उनके तहत बनाए गए नियम जहां लागू हैं, वहां निर्वाचन आयोग को उन्हीं के अनुसार काम करना होगा।
हां, चुनाव के दौरान ऐसी छोटी या व्यावहारिक परिस्थितियां आ सकती हैं जिनके बारे में कानून में स्पष्ट व्यवस्था न हो। ऐसी स्थिति में चुनाव को स्वतंत्र, निष्पक्ष, सुचारु और पारदर्शी तरीके से कराने के लिए आयोग बहुमत से अपने संवैधानिक अधिकारों के तहत आवश्यक निर्देश दे सकता है। निर्वाचन आयोग स्वयं भी स्पष्ट करता है कि जहां कानून मौन हो या पर्याप्त व्यवस्था न हो, वहां अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए निर्देश जारी किए जा सकते हैं।
लेकिन किसी मौजूदा कानून के विपरीत जाकर केवल प्रशासनिक सुविधा के नाम पर नया मूल नियम बनाना अलग बात है। चुनाव की मूल व्यवस्था में बदलाव का अधिकार विधायिका द्वारा कानून बनाने की प्रक्रिया से जुड़ा है।
इसलिए जरूरत है कि निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता भी बनी रहे और उसकी कार्यप्रणाली कानून, पारदर्शिता और निर्धारित प्रक्रिया से बंधी भी रहे।
*लोकतंत्र को दलतंत्र बनने से रोकना होगा (Preventing Party-Centred Democracy)*
राजनीतिक दल लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन लोकतंत्र का अंतिम केंद्र राजनीतिक दल नहीं बल्कि जनता और संविधान होना चाहिए।
हमें ऐसी चुनाव व्यवस्था चाहिए जिसमें-
जाति से ऊपर नीति हो,
धर्म से ऊपर नागरिकता हो,
समीकरण से ऊपर जनहित हो,
वादे से ऊपर उनका पालन हो,
और सत्ता से ऊपर संविधान हो।
चुनाव सुधार का उद्देश्य किसी दल या व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में जाना नहीं है। उद्देश्य केवल इतना होना चाहिए कि जिसे जनता का व्यापक समर्थन मिले, वही शासन करे और शासन करने के बाद भी जनता के प्रति जवाबदेह रहे।
इसलिए 50 प्रतिशत से अधिक मत की अनिवार्यता, जरूरत पड़ने पर रनऑफ चुनाव, घोषणा-पत्र की जवाबदेही और चुनावी संस्थाओं की पारदर्शिता जैसे विषयों पर गंभीर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए।
लोकतंत्र केवल चुनाव से मजबूत नहीं होता।
लोकतंत्र तब मजबूत होता है, जब चुनाव जनता की व्यापक इच्छा का प्रतिनिधित्व करे और चुनाव के बाद सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह रहे।
मजबूत लोकतंत्र के लिए मजबूत और जवाबदेह चुनाव व्यवस्था जरूरी है।
अमरीष कुमार
वार्ड नं. 20, खगड़िया,बिहार
पिन–851204
